नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में तनाव कम करने के लिए अमेरिका की ओर से की जा रही कूटनीतिक कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ समझौते की घोषणा के बावजूद क्षेत्र में हालात सामान्य होते नहीं दिख रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह इजरायल का सख्त रुख माना जा रहा है, जिसने कथित समझौते को लेकर असहमति जताते हुए अपने सैन्य अभियान जारी रखे हैं।
इजरायल और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच ट्रंप प्रशासन ने परमाणु गतिविधियों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर एक समझौते का खाका पेश किया था। इसके तहत ईरान को कुछ आर्थिक राहत देने और होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य आवाजाही बहाल करने जैसे प्रस्तावों की चर्चा रही। हालांकि इजरायल इस पहल को पर्याप्त नहीं मान रहा है।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर इजरायल की सख्त आपत्ति
इजरायल का मानना है कि जब तक ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाता और उसके समर्थित सशस्त्र नेटवर्क को कमजोर नहीं किया जाता, तब तक किसी भी समझौते को भरोसेमंद नहीं माना जा सकता। इजरायली नेतृत्व को आशंका है कि आर्थिक प्रतिबंधों में राहत मिलने से ईरान दोबारा अपनी रणनीतिक और सैन्य क्षमताओं को मजबूत कर सकता है।
इसी वजह से इजरायल ने कूटनीतिक प्रयासों के समानांतर अपने सुरक्षा अभियान जारी रखे हैं। माना जा रहा है कि वह किसी भी संभावित खतरे को पहले ही निष्प्रभावी करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
हमलों का सिलसिला जारी, बढ़ी चिंता
रिपोर्टों के मुताबिक इजरायली सुरक्षा एजेंसियां और वायुसेना ईरान से जुड़े ठिकानों पर कार्रवाई जारी रखे हुए हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर उनका देश किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक पहल साथ-साथ चलती रहीं, तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है। इससे अमेरिका की मध्यस्थता वाली प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
समझौते पर संकट के बादल
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को शामिल किए बिना समझौते को आगे बढ़ाया गया, तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। किसी भी संभावित जवाबी कार्रवाई या सैन्य टकराव की स्थिति में पूरा समझौता खतरे में पड़ सकता है।
इसके अलावा, यदि ईरान को यह महसूस होता है कि समझौते के बावजूद उसके खिलाफ कार्रवाई जारी है, तो वह भी वार्ता प्रक्रिया से पीछे हट सकता है। ऐसी स्थिति में पश्चिम एशिया एक बार फिर बड़े संघर्ष की ओर बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
